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submitted 3 weeks ago by Chanchal@lemmy.today to c/india@lemmy.ml

क्या हमने सोचना बंद कर दिया है?

जब हम अपने नेता की हर बात को सत्य और अपने विरोधी की हर बात को झूठ मानने लगते हैं, जब सवाल पूछना दुश्मनी और असहमति देशद्रोह समझी जाने लगे—तब संकट केवल राजनीति का नहीं, हमारे विवेक का होता है।

काण्ट ने कहा था—“अपनी बुद्धि का उपयोग करने का साहस रखो।”

जॉन स्टुअर्ट मिल ने चेताया कि केवल अपने पक्ष को जानने वाला व्यक्ति किसी विषय को वास्तव में बहुत कम जानता है।

और आंबेडकर ने राजनीति में नायक-पूजा के खतरे से सावधान किया था।

आज सोशल मीडिया, Confirmation Bias, Echo Chamber और AI-generated misinformation के दौर में सवाल और भी बड़ा है—

क्या हम स्वयं सोच रहे हैं, या कोई और हमारे लिए सोच रहा है?

👉 “विवेक का पतन: जब समाज सोचना बंद कर देता है”

पूरी बात पढ़िए और बताइए—

क्या आज हमारे समाज को सबसे ज्यादा जरूरत राजनीतिक बदलाव की है या मानसिक और बौद्धिक जागृति की?

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[-] Chanchal@lemmy.today 1 points 3 weeks ago

कांट, अंबेडकर और अन्य के इन विचारों पर आपकी क्या राय है?"

this post was submitted on 02 Sep 2026
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